(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.293. अध्यायः 293
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
मार्कण्डेयेन स्वस्यानुपमदुःखानुभवितृत्वबुद्ध्या शोचतोयुधिष्ठिरस्य रामोपाख्यानकथनपूर्वकं हेतूपन्यासेन शोकापनोदनम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

मार्कण्डेय उवाच। 3-293-0x(2727)(27225)
एवमेतन्महाबाहो रामेणामिततेजसा।
प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ॥ 3-293-1(27226)
मा शुचः परुषव्याघ्र क्षत्रियोसि परंतप।
बाहुवीर्याश्रयेमार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णये ॥ 3-293-2(27227)
न हि ते वृजिनं किंचिद्दृश्यते परमण्वपि।
अस्मिन्मार्गे निपीदेयुः सेन्द्रा अपि सुरासुराः ॥ 3-293-3(27228)
संहत्य निहतोवृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना।
नमुचिश्चैवदुर्धर्षो दीर्गजिह्वा चराक्षसी ॥ 3-293-4(27229)
सहायवति सर्वार्थाः सतिष्ठन्तीह सर्वशः।
किंनु तस्याजितं सङ्ख्ये यस् भ्राता धनंजयः ॥ 3-293-5(27230)
अयं च बलिनांश्रेष्ठो भीमो भीमपराक्रमाः।
युवानौ च महेष्वासौ वीरौ माद्रवतीसुतौ ॥ 3-293-6(27231)
एभिः सहायैः कस्मात्त्वं विषीदसि परंतप।
य इमे वज्रिणः सेनां जयेयुः समरुद्गणाम् ॥ 3-293-7(27232)
त्वमप्येभिर्महेष्वासैः सहायैर्देवरूपिभिः।
विजेष्यसि रणे सर्वानमित्रान्भरतर्षभ ॥ 3-293-8(27233)
इतश्च त्वमिमां पश्यसैन्धवेन दुरात्मना।
बलिना वीर्यमत्तेन हृतामेभिर्महात्मभिः ॥ 3-293-9(27234)
आनीतां द्रौपदीं कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।
जयद्रथं च राजानं विजितं वशमागतम् ॥ 3-293-10(27235)
असहायेन रामेण वैदेही पुनराहृता।
हत्वासङ्ख्ये दशग्रीवं राक्षसं भीमविक्रमम् ॥ 3-293-11(27236)
यस् शाखामृगामित्राण्यृक्षाः कालमुखास्तथा।
जात्यन्तरगता राजन्नेतद्बुद्ध्याऽनुचिन्तय ॥ 3-293-12(27237)
तस्मात्सर्वं कुरुश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ।
त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परंतप ॥ 3-293-13(27238)
वैशम्पायन उवाच। 3-293-14x(2728)
एवमाश्वासितो राजामार्कण्डेयेन धीमता।
त्यक्त्वा दुःखमदीनात्मा पुनरप्येनमब्रवीत् ॥ 3-293-14(27239)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि रामोपाख्यानपपर्वणि त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 294 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-293-2 दीप्तनिर्णये असंदिग्धे प्रत्यक्षफले ॥


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